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Narayan Naagbali

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इस विधी का प्रमुख उद्देश है अपने अतृप्त पितरोंको तृप्त करके उन्हे सदगती दिलाना। क्योकी मरनेवालों की सभी इच्छाएँ पुरी नही नही हो सकती है। कुछ तीव्र इच्छाएँ मरने के बाद भी आत्मा का पिछा नही छोडती है। इस स्थिती में वायुरूप होने के पश्चात भी आत्मा पृथ्वीपर हि विचरण (भ्रमण) करती है। वास्तव में जीवात्मा सूर्य का अंश होता है। जो निसर्गत: मृत्यू के पश्चात सुर्यकी और आकर्षित होता है। जैसे पृथ्वी पर जल समुद्र की और आकर्षित होता है। किंतु वासना एवं इच्छाएँ आत्मा को इसी वातावरण में रहने के लिए मजबूर कर देती है। इस स्थिती में आत्मा को बहोत पीडाएँ होती है। और अपनी पिडाओंसे मुक्ती पाने के लिए वंशजो को सामने सांसरीक समस्या का निर्माण करता है। इन समस्याओं से मुक्ती पाने हेतु सामान्य इन्सान पहले तो वैद्यकिय सहारा लेता है। यदी उसे समाधान नही मिलता तो ज्योतिष का आधार लेता है। क्योंकी कुंण्‍डली में कुछ ग्रह स्थितीयाँ एैसी होती है जिससे पितृदोष का अनुमान लगाया जा सकता है।

पितरों की संतुष्टी हेतु उनकी श्रध्दा से जो पुजा की जाती है उसी का श्राध्द कहते है। श्राध्द को उचित सामग्री, स्थान, मुहूर्त, शास्त्रसे किया जाए तो निश्चय ही फलदायी बनता है।

नारायण नागबली प्रमुख रुपसे तब करना चाहिए जब अपत्य हिनता, कष्टमय जीवन और दारिद्रय, शरीर के न छुटनेवाले विकार, भुतप्रेत, पिशाच्च्‍ा बाधा, अपमृत्यू, अपघातों का सिलसिला, साथही मे पूर्वजन्म मे मिले शाप, पितृशाप, प्रेतशाप, मातृशाप, भातृशाप, पत्निशाप, मातूलशाप, आदी संकट मनुष्य के सामने निश्चल रूप में खडे हो। इन सभी संकटो से निश्चित रूप से मुक्ती पाने के लिये शास्त्रोक्त काम्य नारायण बली विधान है।

इसके साथही में इसी विधान के साथ नागबली काभी विधान है।

नागबली यह विधी शौनक ऋषीने अतलायी है। किसी व्यक्तीने अपने जीवन मे जो द्रव्य संग्रह किया है। उसके द्रव्य पर आसक्ती रह गयी तो वह व्यक्ती मृत्यू के पश्चात उस द्रव्यपर नाग बनके रह जाता है। और उस द्रव्य का किसी को लाभ नही होने देता। ऐसे नाग की उस जन्म में अथवा पिछले किसी जन्म में हत्या की गयी तो उसका शाप लगता है। उदा:- वात, पित्त, कफ, त्रिदोष, जन्य ज्वर, शुळ, उद, गंडमाला, कुष्ठकंडु, नेत्रकर्णकृच्छ आदी सारे रोगोका निवारण करने के लिए एवंम् संतती प्राप्ती करने के लिए नागबली विधान करना चाहिए। ये विधान श्रीक्षेत्र त्रिबंकेश्वर में ही करने चाहिए।

नारायण नागबली नियम : नागबली यह तीन दिन में संपन्न हानेवाला विधी है। मुहूर्त के पहले दिन रात ९ बजे के पहले पुजा स्थल पे आना अनिवार्य है। विधी की दक्षिणा के अंर्तगत तीन व्यक्तीयों की निवास व्यवस्था की जाती है। अगर तीन व्यक्तीसे जादा लोग आये तो उनका निवास एवंम् भोजन का खर्च अलग करना होगा। विधी के लिए नये सफेद वस्त्र (धोती/गमछा/नॅपकिन अथवा तथा धर्मपत्नी के लिए साडी, ब्लाऊज आदी काला/हरा रंग छोडके लेना है।) सुवर्ण नाग प्रतिमा (सव्वा ग्रॅम) लानी चाहिए। विधी की अन्य व्यवस्था पंडितजी द्वारा की जाती है। पुजा विधी के लिए आनेसे आपका नाम, दूरध्वनी अथवा पत्रद्वारा आपका नाम आरक्षण करना अनिवार्य है क्योकी आपकी सभी सुविधा हम कर सके।